Thursday, 16 May 2013

तस्सवुर 



तस्सवुर में तेरे बैठे हैं भुला के होश और सब्र 

तेरी गुफ्तगू का है कुछ ऐसा असर 
पहचाने रास्तों को भी अब भूलने लगे हैं 
हर राह नै है, अनजान हर सफ़र 


अभी कल ही तो थे हम तमाम महफ़िलों   की    नज़र 

ये क्या हुआ की  दूर  हैं हमसे  आइयाशीयों के शजर 
शहर के अपने लोग हमे बेगाना कह रहे हैं
 हम ढूंढे हैं अपनी शख्सीयत के खंडहर 


उधर हिले लबों के दोआब इधर दिलकश हुआ मंज़र 

म्यान में दिल के खूब उतरा वो नशीला खंजर 
शाम फिर से लेके आई है वायदे सुकून के 
कहाँ प्यासे को होती है मय  यूँ मयस्सर 

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