Friday, 17 May 2013



तन्हा 

तन्हा  थे जब तलक कोई गम न था हमे 
हर लम्हा हमें अब महफ़िल सा लगता है यूँ 
यूँ बदल दिया है हमारे जीने का  अंदाज़ 
हम सांस भी लें तो दर्द सा होता है 

सेहरा में तपिश थी , तल्खियत थी , तिश्नगी थी हमें 
 हुई जो आपकी आमद , हर नज़ारा शादाब लगता है 
मैक़दे जाने का तो पहले भी न था रिवाज़ 
आपकी  शुओं से निकले हैं तो हर नशा सर्द सा होता

खूब भाता था मौसिकी का शौक हमें  

ख्याल उनका ही अब हमें सुकून देता है 
सोज़ सारे गम हैं जबसे सुनी है वो आवाज़ 
हर शब् के खात्मे पे शुरू इंतज़ार होता है 

बारीकियां मोहब्बत की कोई समझा दे हमें,
हुनर ये हमारा हमसे जुदा ही रहता है 
उनकी सरगोशियों से होता है कुछ ऐसा ऐसा आगाज़ 
कशिश बढती ही रहती है और दिल ज़ार  होता है 

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