Friday, 17 May 2013




अफरोज़ 

ख़ामोश बज़्म में शरारत कोई शर्गोश हो गई है 
जुबां किसी की यूँ हमें मदहोश कर गई है 
खूब ऐतबार था हमें गुफ्तगू के हुनर पे 
एक आवाज़ उनकी हमें खामोश कर गई है 

 हमारी मशहूर थी बड़ी, सौबत में उनकी रंग फरोश हो गई है 
खैरियत शब् की हुई अर्श इस तरह, बात यही ख्वाब मेरे फरामोश कर गई है 
रूह-ब-रूह हुए हैं उनसे जब से हम 
एक नज़र उनकी हमें अफरोज़ कर गई है 

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