Friday, 17 May 2013



मक़सूद 

ढूँढधता रहता हूँ नए रास्तों को , पुरानी राहों का अब कोई वजूद नहीं 
घुल गई है उङ्किउङ्कि तस्वीर कुछ इस क़दर मेरे ज़हन में 
मंजिल नई  अब कोई मौजूद नहीं 
खुबसूरत सी वजह मिल जाये कोई अफसाना शुरू हो नया,
 शायर है दिल, इसे और कुछ  मक़सूद नहीं 

पूछता है  अक्स उनके चेहरे का हमसे जब,
" शीशा-ऐ -दिल में कोई और मंज़ूर क्यूँ नहीं, 
बढ़ा चले हो जिन रास्तों पे तुम 
क्यूँ आज भी उनका तुम्हे शौर नहीं?"
ये मस्सोमियत है हमारी या मंजिल कोई मंसूर नहीं  
जवाब तलबी करें दिल से ये बस मंज़ूर नहीं
शायर है दिल… उसे कुछ मक़सूद नहीं 

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